पुलिस थानों में लाखो गाड़ियां क्यों सडाई जाती हैं?
इसका कारण 150 साल पुराना एविडेंस एक्ट है जिसके तहत जिस गाड़ी से अपराध जुड़ा हो वह केस प्रॉपर्टी बन जाती है और जब तक केस का निपटारा न हो, तब तक उसे पुलिस की सुरक्षा में रखा जाता है ।
जब यह कानून बना था , तब तो लोगों के पास साईकल तक नहीं होती थी । मुकदमें भी इक्का दुक्का होते थे । इसलिए यह नियम चल गया ।
आज एक बड़े शहर में हर महीने सैकड़ों गाड़ियों का एक्सीडेंट होता है या अपराध में इस्तेमाल होता है । उसके ऊपर अदालतों में जितने केस का निपटारा नहीं होता है ,उससे 4 गुने नए मामले आ जाते हैं । शहरों में पुलिस थाने टूटी , फूटी , पुरानी इमारतों में चल रहे हैं । ऐसे में पुलिस थानों के बाहर खुले में कारों, बाइक आदि का ढेर लगा रहता है , केस का निपटारा हो या न हो , इनका सड़ना तय है क्योंकि केस बरसों चलेगा ।
एक रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान की राजधानी जयपुर की निचली अदालत में एक हत्या के मामले में पुलिस को कोर्ट में सबूत पेश करने थे. पुलिस ने कहा कि उन्हें सितंबर 2016 में चंदवाजी थाना क्षेत्र से एक युवक का शव मिला था. परिजनों ने हत्या की आशंका जताई, और जयपुर-दिल्ली हाईवे जमा किया था. पुलिस ने जांच की, आरोपी को गिरफ़्तार किया और सबूत भी इकट्ठा किए.
युवक का मृत देह मिलने के कुछ दिन बाद ही पुलिस ने चंजवाजी के ही राहुल कंदेरा और मोहनलाल कंदेरा को हिरासत में लिया. पुलिस ने इन दोनों को हत्या के आरोप में अतिरिक्त ज़िला न्यायाधीश के कोर्ट में पेश किया. पुलिस का कहना था कि उन्होंने 15 सबूत जमा किए और हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू भी बरामद कर लिया. जब कोर्ट में सबूत पेश करने की बारी आई तब पुलिस ने कोर्ट से कहा कि सबूत वाला बैग बंदर ले भागा.
पुलिस ने कोर्ट से कहा कि मालखाने में जगह की कमी की वजह से सबूत से भरे बैग को थाने में ही एक पेड़ के नीच रखा गया. बंदर पेड़ के नीचे से बैग उठाकर भाग गया.
कोर्ट ने पुलिस से हत्या के सबूत पेश करने को कहा, पुलिस का जवाब था, 'हुजूर बैग बंदर चुरा ले गया'
युवक का मृत देह मिलने के कुछ दिन बाद ही पुलिस ने चंजवाजी के ही राहुल कंदेरा और मोहनलाल कंदेरा को हिरासत में लिया. पुलिस ने इन दोनों को हत्या के आरोप में अतिरिक्त ज़िला न्यायाधीश के कोर्ट में पेश किया. पुलिस का कहना था कि उन्होंने 15 सबूत जमा किए और हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू भी बरामद कर लिया. जब कोर्ट में सबूत पेश करने की बारी आई तब पुलिस ने कोर्ट से कहा कि सबूत वाला बैग बंदर ले भागा.
दरअसल , पुलिस व कानून व्यवस्था राज्य सरकार का विषय है । जेल , पुलिस , कोर्ट सुधार इनके लिए चिंता का विषय ही नहीं है क्योंकि इससे सबसे ज्यादा अपराध में लिप्त नेताओं को ही दिक्कत होगी । साक्ष्य कानून बदलने की जिम्मेदारी केंद्र की है । आज फोटो, वीडियो , फोरेंसिक जांच के अनेक तरीके मौजूद हैं । गाड़ी को सड़ा के रखे रहने से ही कौन सा सबूत बना रहता है। इन सबको बदलने की जरूरत है ।
परन्तु आज जब धर्म, जाति , मुफ्त राशन, मुफ्त इलाज , मुफ्त बिजली से चुनाव जीते जा रहे हों तो पुलिस , कोर्ट, कानून सुधार की किसको पड़ी है । और अगर कोई मोदी की तरह सुधार का बीड़ा उठा भी ले तो वकील , जज , विरोधी दल सिर पर आसमान उठा लेंगे ।
अपनी चिंता व्यक्त करने के लिए वर्ष में 2 व्याख्यान प्रधानमंत्री के साथ कानून मंत्री, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दे दिए जाते हैं जिसमें कानून बदलने की आवश्यकता पर बल दिया जाता । जैसे यह कानून ब्रिटेन की संसद से बदलवाने हैं । इसी तरह की खानापूर्ति राज्यों की राजधानियों में मुख्यमंत्री, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा हर साल कर दी जाती है ।
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